Rajat Jain 🚩 #Chanting and #Recitation of #Jain & #Hindu #Mantras and #Prayers – Details, episodes & analysis Podcast details Technical and general information from the podcast's RSS feed.
Rajat Jain 🚩 #Chanting and #Recitation of #Jain & #Hindu #Mantras and #Prayers
Rajat Jain
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Hanumat Dashak हनुमान दशक
Thursday, July 16, 2026 • Duration 02:52
Hanumat Dashak हनुमान दशक
संकट हर सुख देत है, पवन तनय हनुमान।
राम भक्त बजरंगबली, बुद्धि बलज्ञान निधान ॥1 ॥
बालपन में सूर्य को, ग्रस लियो हनुमन्त ।
देवन की सुन विनय को, कष्ट हरे बलवन्त ।।2 ।।
बाली के भय से छिपे, गिरि में जा सुग्रीव।
मरवा बाली राम से, कीन सुखी निज पीव ॥3 ॥
लख चिन्ता में सैन को, कहा ऋशेश्वर टेर।
पार गये तब सिन्धु से, कष्ट हरा सब केर ॥4॥
सुरसा का मद चूर कर, पुनि लंकिन को मार।
दर्श विभीषण को दिखा, पहुंचे बाग मंझार ॥5॥
विरह व्याकुल समय जब, मांगे रुख से आग।
शोक हरा तब सीय का, दे मुन्दरी पद लाग ॥6॥
बाग उजाड़िया अखेय हन, दीनि लंका जार।
दीना धीरज राम को, आके पवन कुमार ॥7॥
लक्ष्मण मूर्छित जब भये, लाये वैद्य सुषेण।
ला दीनी सन्जीवनी, लक्ष्मण पाया चैन ॥8 ॥
नांग फास में फंस गए, राम सहित सब वीर।
हनुमत लाये गरुड़ को, काटी सब की पीर ॥9॥
राम लक्ष्मण को ले गये, अहिरावण पाताल।
मारे सैन सहित सिंह, दीना सूख विशाल ।॥ 10 ॥
पढ़त दशक हनुमन्त का, जो जन मन चित्त लाय। "
बसन्त" तांके काज सब, सिद्ध करत कपिराय ।॥
🕉🟨🕉🟨🕉🟨
Read more Collapse Lajja Gauri Stotra लज्जा गौरी स्तोत्र
Wednesday, June 24, 2026 • Duration 01:53
Lajja Gauri Stotra लज्जा गौरी स्तोत्र
नमस्ते विश्वजननि सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि।
कमलासनसंयुक्ते लज्जागौरि नमोऽस्तु ते॥
त्वं माता सर्वलोकानां त्वं शक्तिः परमेश्वरी।
त्वया धृतं जगत्सर्वं लज्जागौरि नमोऽस्तु ते॥
सर्वसंपत्प्रदे देवि पुत्रपौत्रप्रवर्धिनि।
धनधान्यसमायुक्ते लज्जागौरि नमोऽस्तु ते॥
कामदा मोक्षदा चैव भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी।
भक्तानुग्रहकर्त्री त्वं लज्जागौरि नमोऽस्तु ते॥
पद्ममुखि पद्महस्ते पद्मगर्भे शुभप्रदे।
सृष्टिबीजस्वरूपे त्वं लज्जागौरि नमोऽस्तु ते॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
००००००००००००००००
Read more Collapse Sri Parvathi Shakthi Tandav Stuti श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति
Monday, June 8, 2026 • Duration 06:51
श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति
कुचेल-केश-पाश-बद्ध-मल्लिका-सुगन्धिनी, उमेश-वाम-भाग-नित्य-केलि-कंज-धारिणी। अशोक-पुष्प-पल्लवैः सु-रञ्जित-स्व-मूर्धनी, करोतु शक्ति-ताण्डवं सदा शिवा भवानी ॥1॥
ललाट-बिन्दु-सिन्धु-रक्त रञ्जिता स्व-भालका, धनुर्धरा त्रिशूलिनी कपाल-पाश-धारिणी। कराल-काल-मर्दिनी समस्त-दुःख-हारिणी, नमामि शैल-पुत्रिणीं सदा शिवा भवानी ॥2॥
रणत्-क्वणत्-कणत्-किङ्किणी-नूपुर-घोष-मण्डिता, चलत्-चलत्-पद-क्रमैः सु-विश्व-चक्र-चालिनी। अघोर-रूप-धारिणी घोर-शत्रु-घातिनी, प्रचण्ड-शक्ति-रूपिणी सदा शिवा भवानी ॥3॥
जगज्जननी पावनी प्रसन्न मन्द-हासिनी, सु-भक्त-वृन्द-वन्दिता समस्त-विघ्न-नाशिनी। प्रलय-वह्नि-रञ्जिता महानिभय-दायिनी, जयतु जयतु पार्वती सदा शिवा भवानी ॥4॥
जटा-कटाह-संभ्रम-भ्रमन्-निलिम्पनिर्झरी, विलोम-शक्ति-रूपिणी कराल-खड्ङ्ग-धारिणी। धगद् धगद् धगज्-ज्वलत्-ललाट-पट्ट-पावके, किशोर-चन्द्र-शेखरे रतिं प्रतिक्षणं मम ॥5॥
महा-विचित्र-नृत्त-नाद-डम्ब-डम्ब डम्बिका,
प्रचण्ड-मुण्ड-मण्डली-गले-विराज-मालिका।
दश-दिगन्त-गामिनी सु-तेज-पुञ्ज-भासिनी,
पुनातु माँ सदा-सदा उमा-महेश्वरी विभू ॥6॥
नितम्ब-चन्द्र-कान्ति-कान्त मेखला-सु-शोभिनी,
कराल-दंष्ट्र-भास्वरा सु-जिह्व-रक्त-रञ्जिता।
महिष-दैत्य-मर्दिनी सुरेन्द्र-दुःख-भञ्जिनी,
जयतु शैल-नन्दिनी शिवा-शवा-विहारिणी ॥7॥
नवाक्षर-मन्त्र-मयी त्रिनेत्र-तेज-दायिनी, कुलाकुल-स्वरूपिणी महा-विपत्ति-हारिणी। समस्त-सिद्ध-योगिनी गणेश्वर-प्रमोदिनी, भजामि दिव्य-पार्वतीं शिव-प्रिया-मनोहराम् ॥৪॥
Bala Krishna Ashtakam बालकृष्ण अष्टकम्
Sunday, March 29, 2026 • Duration 03:09
Bala Krishna Ashtakam बालकृष्ण अष्टकम्
श्रीमन्नन्दयशोदा हृदयस्थित भावतत्परो भगवान् ।
पुत्रीकृत निजरूपः स जयति पुरतः कृपालुर्बालकृष्णः ॥ १॥
कथमपि रिङ्गणम करोद ङ्गणगतजानु घर्षणोद्युक्तः ।
कटितटकिङ्किणि जालस्वन शङ्कितमानसः सदा ह्यास्ते ॥ २॥
विकसितपङ्कज नयनः प्रकटित हर्षः सदैव धूसराङ्गः ।
परिगच्छति कटिभङ्ग प्रसरीकृत पाणियुग्माभ्याम् ॥ ३॥
उपलक्षित दधिभाण्डः स्फुरितब्रह्माण्ड विग्रहो भुङ्क्ते ।
मुष्टीकृतनवनीतः परमपुनीतो मुग्धभावात्मा ॥ ४॥
नम्रीकृतविधुवदनः प्रकटीकृत चौर्यगोपनायासः ।
स्वाम्बोत् सङ्गविलासः क्षुधितः सम्प्रति दृश्यते स्तनार्थी ॥ ५॥
सिंहनखाकृति भूषणभूषित हृदयः सुशोभते नित्यम् ।
कुण्डलमण्डितगण्डः साञ्जन नयनो निरञ्जनः शेते ॥ ६॥
कार्यासक्त यशोदागृह कर्मावरोधकः सदाऽऽस्ते ।
तस्याः स्वान्त निविष्ट प्रणय प्रभाजनो यतोऽयम् ॥ ७॥
इत्थं व्रजपति तरुणी नमनीयं ब्रह्मरुद्राद्यैः ।
कमनीयं निजसूनुं लालयति स्म प्रत्यहं प्रीत्या ॥ ८॥
श्रीमद्वल्लभ कृपया विशदीकृतम एतदष्टकं पठेद्यः ।
तस्य दयानिधिकृष्णे भक्तिः प्रेमैकलक्षणा शीघ्रम् ॥ ९॥
Laghu Saptashati लघु सप्तशती
Episode 1
Friday, March 20, 2026 • Duration 06:51
लघु दुर्गासप्तशती -
माँ दुर्गा सभी दुखों को हर लेगी। यह पाठ करने से सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ करने का फल प्राप्त होता है।
इसका पाठ कसी भी नवरात्रि में माँ दुर्गा के सामने गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करके और धूपबत्ती करके प्रतिदिन नौ पाठ करने चाहिए। इस पाठ से दुर्गा सप्तशती का फल मिलता है। इसके पाठ से सभी कामनाये सिद्ध हो जाती हैं। इसके पाठ से शत्रु बाधा एवं नवग्रह बाधा शांत हो जाती है। यह पाठ बीजमंत्रों से भरपूर है और माँ दुर्गा की सम्पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।
ॐ ब्रीं-ब्रीं-ब्रीं वेणु-हस्ते, स्तुत-सुर-बटुकै: हां गणेशस्य माता। स्वानन्दे नन्द-रुपे, अनहत-निरते, मुक्तिदे मुक्ति-मार्गे॥
हंसः सोहं विशाले, वलय-गति-हसे, सिद्ध-देवी समस्ता।
हीं-हीं-हीं सिद्ध-लोके, कच-रुचि-विपुले, वीर-भद्रे नमस्ते॥१॥
ॐ हींकारोच्चारयन्ती, मम हरति भयं, चण्ड-मुण्डौ प्रचण्डे।
खां-खां-खां खड्ग-पाणे, ध्रक-ध्रक ध्रकिते, उग्र-रुपे स्वरुपे॥
हुँ-हुँ हुँकांर-नादे, गगन-भुवि-तले, व्यापिनी व्योम-रुपे।
हं-हं हंकार-नादे, सुर-गण-नमिते, चण्ड-रुपे नमस्ते॥२॥
ऐं लोके कीर्तयन्ती, मम हरतु भयं, राक्षसान् हन्यमाने।
घ्रां-घ्रां-घ्रां घोर-रुपे, घघ-घघ-घटिते, घर्घरे घोर-रावे ॥
निर्मांसे काक-जंघे, घसित-नख-नखा, धूम्र-नेत्रे त्रि-नेत्रे।
हस्ताब्जे शूल-मुण्डे, कुल-कुल ककुले, सिद्ध-हस्ते नमस्ते॥३॥
ॐ क्रीं-क्रीं-क्रीं ऐं कुमारी, कुह-कुह-मखिले, कोकिलेनानुरागे।
मुद्रा-संज्ञ-त्रि-रेखा, कुरु-कुरु सततं, श्री महा-मारि गुह्ये॥
तेजांगे सिद्धि-नाथे, मन-पवन-चले, नैव आज्ञा-निधाने।
Hanumat Kavacham हनुमत् कवचम्
Tuesday, February 24, 2026 • Duration 06:06
श्रीमदानन्दरामायणान्तर्गत श्रीहनुमत्कवचं!! ✓
ॐ श्री हनुमते नमः ॥
ॐ अस्य श्रीहनुमत्कवच स्तोत्र महामन्त्रस्य,
श्रीरामचन्द्र ऋषिः । श्रीहनुमान् परमात्मा देवता ।
अनुष्टुप् छन्दः। मारुतात्मजेति बीजंअञ्जनीसूनुरिति शक्तिः। लक्ष्मणप्राणदातेति कीलकं ।
रामदूतायेत्यस्त्रं । हनुमान् देवता इति कवचं ।
पिङ्गाक्षोमित विक्रम इति मन्त्रः।श्रीरामचन्द्र प्रेरणया रामचन्द्र प्रीत्यर्थंमम सकल कामना सिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ॥
करन्यासः
ॐ ह्रां अञ्जनीसुताय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रीं रुद्र मूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ ह्रूं रामदूताय मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रैं वायुपुत्राय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रौं अग्निगर्भाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रः ब्रह्मास्त्र निवारणाय करतल करपृष्ठाभ्यां नमः।
अङ्गन्यासः ॥
ॐ ह्रां अञ्जनीसुताय हृदयाय नमः ।
ॐ ह्रीं रुद्र मूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ ह्रूं रामदूताय शिकायै वषट् ।
ॐ ह्रैं वायुपुत्राय कवचाय हुं ।
ॐ ह्रौं अग्निगर्भाय नत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ ह्रः ब्रह्मास्त्र निवारणाय अस्त्राय फट् ।
भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः।
अथ ध्यानम् ॥
ध्यायेत्बालदिवाकर द्युतिनिभं देवारिदर्पापहं
देवेन्द्र प्रमुखं प्रशस्त यशसं देदीप्यमानं रुचा ।
सुग्रीवादि समस्तवानरयुतं सुव्यक्त तत्त्वप्रियं
Sri Kameshwari Stuti श्री कामेश्वरी स्तुति
Friday, February 13, 2026 • Duration 03:16
Sri Kameshwari Stuti श्री कामेश्वरी स्तुति
ओम ऐं ह्मीं क्लीं कामाख्यायै नमः।
ओम क्लीं क्लीं कामाख्या क्लीं क्लीं नमः।
युधिष्ठिर उवाच -
नमस्ते परमेशानि ब्रह्मरूपे सनातनि ।
सुरासुरजगद्वन्द्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १॥
न ते प्रभावं जानन्ति ब्रह्माद्यास्त्रिदशेश्वराः ।
प्रसीद जगतामाद्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ २॥
अनादिपरमा विद्या देहिनां देहधारिणी ।
त्वमेवासि जगद्वन्द्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ ३॥
त्वं बीजं सर्वभूतानां त्वं बुद्धिश्चेतना धृतिः ।
त्वं प्रबोधश्च निद्रा च कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ ४॥
त्वामाराध्य महेशोऽपि कृतकृत्यं हि मन्यते ।
आत्मानं परमात्माऽपि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ ५॥
दुर्वृत्तवृत्तसंहर्त्रि पापपुण्यफलप्रदे ।
लोकानां तापसंहर्त्रि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ ६॥
त्वमेका सर्वलोकानां सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ।
करालवदने कालि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ ७॥
प्रपन्नार्तिहरे मातः सुप्रसन्नमुखाम्बुजे ।
प्रसीद परमे पूर्णे कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ ८॥
त्वामाश्रयन्ति ये भक्त्या यान्ति चाश्रयतां तु ते ।
Ganpati Keelakam गणपति कीलकम्
Tuesday, February 3, 2026 • Duration 09:05
Shri Ganesh Keelak Stotram श्री गणेश कीलक स्तोत्रम्
दक्ष उवाच।
गणेशकीलकं ब्रह्मन् वद सर्वार्थदायकम्।
मन्त्रादीनां विशेषेण सिद्धिदं पूर्णभावतः।।१।।
मुद्गल उवाच।
कीलकेन विहीनाश्च मन्त्रा नैव सुखप्रदाः।
आदौ कीलकमेवं वै पठित्वा जपमाचरेत्।।२।।
तदा वीर्ययुता मन्त्रा नानासिद्धिप्रदायकाः।
भवन्ति नात्र सन्देहः कथयामि यथाश्रुतम्।।३।।
समादिष्टं चाङ्गिरसा मह्यं गुह्यतमं परम्।
सिद्धिदं वै गणेशस्य कीलकं शृणु मानद।।४।।
अस्य श्रीगणेशकीलकस्य शिव ऋषिः। अनुष्टुप्छन्दः। श्रीगणपतिर्देवता। ॐ गं योगाय स्वाहा। ॐ गं बीजम्। विद्याशक्तिगणपतिप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
छन्दऋष्यादिन्यासांश्च कुर्यादादौ तथा परान्।
एकाक्षरस्यैव दक्ष षडङ्गानाचरेत् सुधीः।।५।।
ततो ध्यायेद्गणेशानं ज्योतिरूपधरं परम्।
मनोवाणीविहीनं च चतुर्भुजविराजितम्।।६।।
शुण्डादण्डमुखं पूर्णं द्रष्टुं नैव प्रशक्यते।
विद्याऽविद्यासमायुक्तं विभूतिभिरुपासितम्।।७।।
एवं ध्यात्वा गणेशानं मानसैः पूजयेत्पृथक्।
पञ्चोपचारकैर्दक्ष ततो जपं समाचरेत्।।८।।
Maha Lakshmi Stotram महालक्ष्मी स्तोत्रम्
Wednesday, January 28, 2026 • Duration 08:30
// श्री महालक्ष्मी स्तोत्र //
श्री गणेशाय नमः !!
पद्मे पद्मपलाशाक्षि जय त्वं श्रीपतिप्रिये ।
जयमातर्महालक्ष्मि संसारार्णवतारिणि ॥१॥
महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि ।
हरिप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ॥२॥
पद्मालये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं च सर्वदे ।
सर्वभूताहितार्थाय वसुवृष्टिं सदा कुरु ॥३॥
जगन्मातर्नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ।
दयावति नमस्तुभ्यं विश्वेश्वरि नमोऽस्तुते ॥४॥
नमः क्षीरार्णवसुते नमस्त्रैलोक्यधारिणि ।
वसुवृष्टे नमस्तुभ्यं रक्ष मां शरणागतम् ॥५॥
रक्ष त्वंदेवदेवेशि देवदेवस्य वल्लभे ।
दारिद्र्यात्त्राहि मां लक्ष्मि कृपां कुरु ममोपरि ॥६॥
नमस्त्रैलोक्यजननि नमस्त्रैलोक्यपावनि ।
ब्रह्मादयो नम्म्ति त्वां जगदानंददायिनि ॥७॥
विष्णुप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं जगद्धिते ।
आर्तिहंत्रि नमस्तुभ्यं समृद्धिं कुरु मे सदा ॥८॥
अब्जवासे नमस्तुभ्यं चपलायै नमो नमः ।
चंचलायै नमस्तुभ्यं ललितायै नमो नमः ॥९॥
नमः प्रद्युम्रजननि मातस्तुभ्यं नमो नमः ।
Ganesh Stavraj गणेश स्तवराज
Sunday, January 4, 2026 • Duration 04:47
Ganesh Stavraj गणेश स्तवराज
अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं निरानन्दमद्वैतमानन्दपूर्णम् ।
परं निर्गुणं निर्विशेषं निरीहं परब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ १॥
गुणातीतमाद्यं चिदानन्दरूपं चिदाभासकं सर्वगं ज्ञानगम्यम् ।
मुनिध्येयमाकाशरूपं परेशं परब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ २॥
जगत्कारणं कारणाज्ञानरूपं सुरादिं सुखादिं युगादिं गणेशम् ।
जगद्वापिनं विश्ववन्द्यं सुरेशं परब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥ ३॥
रजोयोगततो ब्रह्मरूपं श्रुतिज्ञं सदा कार्यसक्तं हृदाऽचिन्त्यरूपम् ।
सर्वविद्यानिधानं जगत्कारकं परब्रह्मरूपं गणेशं नताः स्मः ॥ ४॥
सदा सत्त्वयोगं मुदा क्रीडमानं सुरारीन् हरन्तं जगत्पालयन्तम् ।
अनेकावतारं निजाज्ञानहारं सदा विष्णुरूपं गणेशं नमामः ॥ ५॥
तमोयोगिनं रुद्ररूप त्रिनेत्रं जगद्धारकं तारकं ज्ञानहेतुम् ।
अनेकागमैः स्वं जनं बोधयन्तं सदा शर्वरूपं गणेशं नमामः ॥ ६॥
तमःस्तोमहारं जनाज्ञानहारं त्रयीवेदसारं परब्रह्मपारम् ।
मुनिज्ञानकारं विदूरे विकारं सदा ब्रह्मरूपं गणेशं नमामः ॥ ७॥
निजैरौषधीस्तर्पयन्तं करोधैः सुरौघान्कलाभिः सुधास्राविणीभिः |
दिनेशांशु सन्तापहारं द्विजेशं शशाङ्कस्वरूपं गणेशं नमामः ॥ ८॥
प्रकाशस्वरूपं नभोवायुरूपं विकारादिहेतुं कलाकालभूतम् ।
प्रफुल्ल-नील-पङ्कज-प्रपञ्च-कालिम-प्रभा-वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचि प्रबद्ध कन्धरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजाम्विका-वृषध्वजं नमामि शम्भु-सुन्दरीम् ॥9॥
क्वचिद्-दिगम्बरी-छटा-विचित्र-रूप-धारिणी, क्वचिद्-मृणाल-कोमला सु-पुष्प-हार-धारिणी। क्वचिद्-महा-भयङ्करा कराल-काल-रूपिणी, नमामि तां जगन्मयीं शिवा-सखीं सु-पावनीम् ॥10॥
रणत् मृदङ्ग शङ्ख नाद घोर श ब्द मण्डिता, चलत् कपाल कुण्डला फणा मणि विभूषिता। धनु र्विमुक्त सायकैः सुरारि सैन्य दारिणी, प्रचण्ड चण्ड नन्दिनीं नमामि दैत्य हारिणीम् ॥11॥
नृमुण्ड माल मण्डिता विशीर्ण केस पाशिका, कराल लोल जिह्विका त्रिलोक त्रास नाशिनी। महा कपाल पात्र गा सु रक्त पान कारिणी, जयत्य मेघ सुन्दरी महा धमाधम ध्वनिः ।॥12॥
समस्त शक्ति चक्र गा सु बिन्दु मध्य वासिनी, षडब्ज भेदिनी मुदा महा सुषुम्न वाहिनी। महा प्रकाश पुञ्जिका शिव स्वरुप कारिणी, मनस्विनि नमोऽस्तुते प्रपन्न भक्त तारिणी ॥13॥
अखण्ड शक्ति मण्डले सदैव काल कालिनी, विचित्र सृष्टि कारिणी सदा सु मङ्गल प्रदा। इदं हि नित्य मेव मुक्त मुत्तमोत्तमं स्तवं, पठन् स्मरन् ब्रुवन् नरो विशुद्धिमेति संततम् ॥14॥
नमस्ते नमस्ते महा शक्ति रूपे, नमस्ते नमस्ते शिवे शान्त रूपे। नमस्ते नमस्ते जगद् व्याप्त देहे, नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥15॥
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इति श्रीकृष्णदासकृतं बालकृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् ।
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ऐंकारे रात्रि-मध्ये, स्वपित-पशु-जने, तत्र कान्ते नमस्ते॥४॥
ॐ व्रां-व्रीं-व्रूं व्रैं कवित्वे, दहन-पुर-गते रुक्मि-रुपेण चक्रे।
त्रिः-शक्तया, युक्त-वर्णादिक, कर-नमिते, दादिवं पूर्व-वर्णे॥
ह्रीं-स्थाने काम-राजे, ज्वल-ज्वल ज्वलिते, कोशिनि कोश-पत्रे।
स्वच्छन्दे कष्ट-नाशे, सुर-वर-वपुषे, गुह्य-मुण्डे नमस्ते॥५॥
ॐ घ्रां-घ्रीं-घ्रूं घोर-तुण्डे, घघ-घघ घघघे घर्घरान्याङि्घ्र-घोषे।
ह्रीं क्रीं द्रूं द्रोञ्च-चक्रे, रर-रर-रमिते, सर्व-ज्ञाने प्रधाने॥
द्रीं तीर्थेषु च ज्येष्ठे, जुग-जुग जजुगे म्लीं पदे काल-मुण्डे।
सर्वांगे रक्त-धारा-मथन-कर-वरे, वज्र-दण्डे नमस्ते॥६॥
ॐ क्रां क्रीं क्रूं वाम-नमिते, गगन गड-गडे गुह्य-योनि-स्वरुपे।
वज्रांगे, वज्र-हस्ते, सुर-पति-वरदे, मत्त-मातंग-रुढे॥
स्वस्तेजे, शुद्ध-देहे, लल-लल-ललिते, छेदिते पाश-जाले।
किण्डल्याकार-रुपे, वृष वृषभ-ध्वजे, ऐन्द्रि मातर्नमस्ते॥७॥
ॐ हुँ हुँ हुंकार-नादे, विषमवश-करे, यक्ष-वैताल-नाथे।
सु-सिद्धयर्थे सु-सिद्धैः, ठठ-ठठ-ठठठः, सर्व-भक्षे प्रचण्डे॥
जूं सः सौं शान्ति-कर्मेऽमृत-मृत-हरे, निःसमेसं समुद्रे।
देवि, त्वं साधकानां, भव-भव वरदे, भद्र-काली नमस्ते॥८॥
ब्रह्माणी वैष्णवी त्वं, त्वमसि बहुचरा, त्वं वराह-स्वरुपा।
त्वं ऐन्द्री त्वं कुबेरी, त्वमसि च जननी, त्वं कुमारी महेन्द्री॥
ऐं ह्रीं क्लींकार-भूते, वितल-तल-तले, भू-तले स्वर्ग-मार्गे।
पाताले शैल-श्रृंगे, हरि-हर-भुवने, सिद्ध-चण्डी नमस्ते॥९॥
हं लं क्षं शौण्डि-रुपे, शमित भव-भये, सर्व-विघ्नान्त-विघ्ने।
गां गीं गूं गैं षडंगे, गगन-गति-गते, सिद्धिदे सिद्ध-साध्ये॥
वं क्रं मुद्रा हिमांशोर्प्रहसति-वदने, त्र्यक्षरे ह्सैं निनादे।
हां हूं गां गीं गणेशी, गज-मुख-जननी, त्वां महेशीं नमामि॥१०॥
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संसक्तारुण लोचनं पवनजं पीताम्बरालङ्कृतं ॥ १॥
उद्यन् मार्ताण्डकोटि प्रकट रुचियुतं चारुवीरासनस्थं
मौञ्जी यज्ञोपवीताभरण रुचिशिखं शोभितं कुण्डलाङ्गं ।
भक्तानामिष्टदं तं प्रणतमुनिजनं वेदनाद प्रमोदं
ध्यायेदेवं विधेयं प्लवग कुलपतिं गोष्पदीभूत वार्धिं ॥ २॥
वज्राङ्गं पिङ्गकेशाढ्यं स्वर्णकुण्डल मण्डितं
निगूढमुपसङ्गम्य पारावार पराक्रमं ॥ ३॥
स्फटिकाभं स्वर्णकान्तिं द्विभुजं च कृताञ्जलिं ।
कुण्डल द्वय संशोभिमुखांभोजं हरिं भजे ॥ ४॥
सव्यहस्ते गदायुक्तं वामहस्ते कमण्डलुं ।
उद्यद् दक्षिण दोर्दण्डं हनुमन्तं विचिन्तयेत् ॥ ५॥
ॐ नमो हनुमते शोभिताननाय यशोलङ्कृताय
अञ्जनीगर्भ संभूताय। राम लक्ष्मणानन्दकाय।
कपिसैन्य प्रकाशन पर्वतोत्पाटनाय।
सुग्रीवसाह्यकरण परोच्चाटन। कुमार ब्रह्मचर्य।
गंभीर शब्दोदय।ॐ ह्रीं सर्वदुष्टग्रह निवारणाय स्वाहा।
ॐ नमो हनुमते एहि एहि।सर्वग्रह भूतानां शाकिनी डाकिनीनां विशमदुष्टानां सर्वेषामाकर्षयाकर्षय ।
मर्दय मर्दय । छेदय छेदय । मर्त्यान् मारय मारय ।
शोषय शोषय। प्रज्वल प्रज्वल।भूतमण्डल पिशाचमण्डल निरसनाय। भूतज्वर प्रेतज्वर चातुर्थिकज्वर ब्रह्मराक्षस पिशाचः छेदनः क्रिया विष्णुज्वर। महेशज्वरं छिन्धि छिन्धि। भिन्धि भिन्धि । अक्षिशूले शिरोभ्यन्तरे ह्यक्षिशूले गुल्मशूले
पित्तशूले ब्रह्म राक्षसकुल प्रबल नागकुलविष निर्विषझटितिझटिति । ॐ ह्रीं फट् घेकेस्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते पवनपुत्र वैश्वानरमुख पापदृष्टि शोदा दृष्टि हनुमते घो अज्ञापुरे स्वाहा ।स्वगृहे द्वारे पट्टके तिष्डतिष्ठेति तत्र रोगभयं राजकुलभयं नास्ति ।
तस्योच्चारण मात्रेण सर्वे ज्वरा नश्यन्ति ।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं फट् घेघेस्वाहा ।
हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः ।
अधस्तु विष्णु भक्तस्तु पातु मध्यं च पावनिः ॥ १॥
लङ्का विदाहकः पातु सर्वापद्भ्यो निरन्तरं ।
सुग्रीव सचिव: पातु मस्तकं वायुनन्दनः ॥ २॥
भालं पातु महावीरो भृवोर्मध्ये निरन्तरं ।
नेत्रे छायापहारी च पातु नः प्लवगेश्वरः ॥ ३॥
कपोले कर्णमूले च पातु श्रीरामकिङ्करः ।
नासाग्रं अञ्जनीसूनुः पातु वक्त्रं हरीश्वरः ॥ ४॥
वाचं रुद्रप्रियः पातु जिह्वां पिङ्गल लोचनः ।
पातु देवः फाल्गुनेष्टः चिबुकं दैत्यदर्पहा ॥ ५॥
पातु कण्ठं च दैत्यारिः स्कन्धौ पातु सुरार्चितः ।
भुजौ पातु महातेजाः करौ च चरणायुधः ॥ ६॥
नगरन् नखायुधः पातु कुक्षौ पातु कपीश्वरः ।
वक्षो मुद्रापहारी च पातु पार्श्वे भुजायुधः ॥ ७॥
लङ्का निभञ्जनः पातु पृष्ठदेशे निरन्तरं ।
नाभिं च रामदूतस्तु कटिं पात्वनिलात्मजः ॥ ८॥
गुह्यं पातु महाप्राज्ञो लिङ्गं पातु शिवप्रियः ।
ऊरू च जानुनी पातु लङ्काप्रसाद भञ्जनः ॥ ९॥
जङ्घे पातु कपिश्रेष्ठोः गुल्फौ पातु महाबलः ।
अचलोद्धारकः पातु पादौ भास्कर सन्निभः ॥ १०॥
अङ्गान्यमित सत्वाढ्यः पातु पादरङ्गुलीस्तथा ।
सर्वाङ्गानि महाशूरः पातु रोमाणि चाक्मवित् ॥ ११॥
हनुमत् कवचं यस्तु पठेद् विद्वान् विचक्षणः ।
स एव पुरुषश्रेष्ठो भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ १२॥
त्रिकालमेककालं वा पठेन् मासत्रयं नरः ।
सर्वान् रिपून् क्षणान् जित्वा स पुमान् श्रियमाप्नुयात् ॥ १३॥
इति श्रीशतकोटि रामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मिकीये मनोहरकाण्डे श्रीहनुमत्कवचं सम्पूर्णं॥
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जगतां त्रिजगद्धात्रि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ ९॥
शुद्धज्ञानमये पूर्णे प्रकृतिः सृष्टिभाविनी ।
त्वमेव मातर्विश्वेशि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १०॥
।।इति श्रीमहाभागवते महापुराणे युधिष्ठिरकृता कामेश्वरीस्तुतिः सम्पूर्णा ।।
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एकविंशतिवारं तु जपं कुर्यात्प्रजापते।
ततः स्तोत्रं समुच्चार्य पश्चात्सर्वं समाचरेत्।।९।।
रूपं बलं श्रियं देहि यशो वीर्यं गजानन।
मेधां प्रज्ञां तथा कीर्तिं विघ्नराज नमोऽस्तु ते।।१०।।
यदा देवादयः सर्वे कुण्ठिता दैत्यपैः कृताः।
तदा त्वं तान्निहत्य स्म करोषि वीर्यसंयुतान्।।११।।
तथा मन्त्रा गणेशान कुण्ठिताश्च दुरात्मभिः।
शापैश्च तान्सवीर्यांस्ते कुरुष्व त्वं नमो नमः।।१२।।
शक्तयः कुण्ठिताः सर्वाः स्मरणेन त्वया प्रभो।
ज्ञानयुक्ताः सवीर्याश्च कृता विघ्नेश ते नमः।।१३।।
चराचरं जगत्सर्वं सत्ताहीनं यदा भवेत्।
त्वया सत्तायुतं ढुण्ढे स्मरणेन कृतं च ते।।१४।।
तत्त्वानि वीर्यहीनानि यदा जातानि विघ्नप।
स्मृत्या ते वीर्ययुक्तानि पुनर्जातानि ते नमः।।१५।।
ब्रह्माणि योगहीनानि जातानि स्मरणेन ते।
यदा पुनर्गणेशान योगयुक्तानि ते नमः।।१६।।
इत्यादि विविधं सर्वं स्मरणेन च ते प्रभो।
सत्तायुक्तं बभूवैव विघ्नेशाय नमो नमः।।१७।।
तथा मन्त्रा गणेशान वीर्यहीना बभूविरे।
स्मरणेन पुनर्ढुण्ढे वीर्ययुक्तान्कुरुष्व ते।।१८।।
सर्वं सत्तासमायुक्तं मन्त्रपूजादिकं प्रभो।
मम नाम्ना भवतु ते वक्रतुण्डाय ते नमः।।१९।।
उत्कीलय महामन्त्रान् जपेन स्तोत्रपाठतः।
सर्वसिद्धिप्रदा मन्त्रा भवन्तु त्वत्प्रसादतः।।२०।।
गणेशाय नमस्तुभ्यं हेरम्बायैकदन्तिने।0
स्वानन्दवासिने तुभ्यं ब्रह्मणस्पतये नमः।।२१।।
गणेशकीलकमिदं कथितं ते प्रजापते।
शिवप्रोक्तं तु मन्त्राणामुत्कीलनकरं परम्।।२२।।
यः पठिष्यति भावेन जप्त्वा ते मन्त्रमुत्तमम्।
स सर्वसिद्धिमाप्नोति नानामन्त्रसमुद्भवाम्।।२३।।
एनं त्यक्त्वा गणेशस्य मन्त्रं जपति नित्यदा।
स सर्वफलहीनश्च जायते नात्र संशयः।।२४।।
सर्वसिद्धिकरं प्रोक्तं कीलकं परमाद्भुतम्।
पुरानेन स्वयं शम्भुर्मन्त्रजां सिद्धिमालभत्।।२५।।
विष्णुर्ब्रह्मादयो देवा मुनयो योगिनः परे।
अनेन मन्त्रसिद्धिं ते लेभिरे च प्रजापते।।२६।।
ऐलः कीलकमाद्यं वै कृत्वा मन्त्रपरायणः।
गतः स्वानन्दपूर्यां स भक्तराजो बभूव ह।।२७।।
सस्त्रीको जडदेहेन ब्रह्माण्डमवलोक्य तु।
गणेशदर्शनेनैव ज्योतीरूपो बभूव ह।।२८।।
Esho जडशरीरस्थः कथं देवादिकैर्युतम्।
ब्रह्माण्डं स ददर्शैव तन्मे वद कुतूहलम्।।२९।।
पुण्यराशिः स्वयं साक्षान्नरकादीन् महामते।
अपश्यच्च कथं सोऽपि पापिदर्शनयोग्यकान्।।३०।।
विमानस्थः स्वयं राजा कृपया तान् ददर्श ह।
गाणेशानां जडस्थश्च शिवविष्णुमुखान् प्रभो।।३१।।
स्वानन्दगे विमाने ये संस्थितास्ते शुभाशुभे।
योगरूपतया सर्वे दक्ष पश्यन्ति चाञ्जसा।।३२।।
एतत्ते कथितं सर्वमैलस्य चरितं शुभम्।
यः शृणोति स वै मर्त्यः भुक्तिं मुक्तिं लभेद्ध्रुवम्।।३३।।
।। इति श्रीमुद्गलमहापुराणे पङ्चमे खण्डे लम्बोदरचरिते श्रवणमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्याये श्रीगणेशकीलकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
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परिपालय भो मातर्मा तुभ्यं शरणागतम् ॥१०॥
शर्ण्ये त्वां प्रपन्नोऽस्मि कमले कमलालये ।
त्राहि त्राहि महालक्ष्मि परित्राणपरायणे ॥११॥
पांडित्यं शोभते नैव न शोभंति गुणा नरे ।
शीलत्वं नैव शोभेत महालक्ष्मि त्वयाविना ॥१२॥
तावद्धिराजते रूपं तावच्छीलं विराजते ।
तावद्गुणा नराणां च यावल्लक्ष्मीः प्रसीदति ॥१३॥
लक्ष्मि त्वयालंकृतमानवा ये पापैर्विमुक्तानृपलोकमान्याः ।
गुणैर्विहीना गुणिनो भवंति दुःशीलिनः शीलवतां वरिष्ठाः ॥१४॥
लक्ष्मीर्भूषयते रूपं लक्ष्मीर्भूषयते कुलम् ।
लक्ष्मीर्भूषयते विद्यां सर्वाल्लक्ष्मीर्विशिष्यते ॥१५॥
अस्माभिस्तव रूपलक्षणगुणान्वक्तुः कथं शक्यते ।
मातर्मा परिपाहि विश्वजननि कृत्वा ममेष्टं ध्रुवम् ॥१६॥
दैन्यार्तिभीतं भवतापपीडितं धनैर्विहीनं तव पार्श्वमागतम् ।
कृपानिधित्वान्मम लक्ष्मि सत्वरं धनप्रदानाद्धननायक्म कुरु ॥१७॥
मां विलोक्य जननि हरिप्रिये निर्धनं तव समीपमागतम् ।
देहि मे झटिति लक्ष्मि कराग्रं वस्त्रकांचनवरान्नमद्भुतम् ॥१८॥
त्वमेव जननी लक्ष्मि पिता लक्ष्मि त्वमेव च ।
भ्राता त्वं च सखा लक्ष्मि विद्या लक्ष्मि त्वमेव च ॥१९॥
त्राहि त्राहि महालक्ष्मि त्राहि त्राहि सुरेश्वरि ।
त्राहि त्राहि जगन्मातर्दारिद्र्यात्त्राहिवेगतः ॥२०॥
नमस्तुभ्यं जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं नमो नमः ।
धर्माधारे नमस्तुभ्यं नमः संपत्तिदायिनि ॥२१॥
दारिद्र्यार्णवामग्नोऽहं निमग्नोऽहं रसातले ।
मज्जंतं मां करे धृत्वा सुद्धर त्वं रमे द्रुतम् ॥२२॥
किं लक्ष्मि बहुनोक्तेन जल्पितेन पुनः पुनः ।
अनन्मे शरण नास्ति सत्यं सत्यं हरिप्रिये ॥२३॥
एतच्छुत्वाऽगस्तिवाक्यं ह्रष्यमाणा हरिप्रिया ।
उवाच मधुरां वाणीं तुष्टाऽहं तव सर्वदा ॥२४॥
लक्ष्मीरुवाच । यत्त्वयोक्तमिदं स्तोत्रं यः पठिष्यति मानवः ।
श्रृणोति च महाबागस्तस्याहं वशवर्तिनी ॥२५॥
नित्यं पठति यो भक्त्या त्वलक्ष्मीस्तस्य नश्यति ।
ऋणं च नश्यते तीव्रं वियोगं नैव पश्यति ॥२६॥
यः पठेत्प्रातरुत्थाय श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
गृहे तस्य सदा स्थास्ये नित्यं श्रीपतिनासह ॥२७॥
सुखसौभाग्यसंपन्नो मनस्वी बुद्धिमान् भवेत् ।
पुत्रवान् गुणवान् श्रेष्ठो भोगभोक्ता च मानवः ॥२८॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं लक्ष्म्यगस्तिप्रकीर्तितम् ।
विष्णुप्रसादजननं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥२९॥
राजद्वारे जयश्चैव शत्रोश्चैव पराजयः ।
भूतप्रेतपिशाचानां व्याघ्राणां न भयं तथा ॥३०॥
न शस्त्रानलतो यौधाद्भयं तस्य प्रजायते ।
दुर्वृत्तानां च पापानां बहुहानिकरं परम् ॥३१॥
मंदुराकरिशालासु गवां गोष्ठे समाहितः ।
पठेत्तद्दोषशांत्यर्थं महापातकनाशनम् ॥३२॥
सर्वसौख्यकरं नृणामायुरारोग्यदं तथा ।
अगस्तिमुनिना प्रोक्तं प्रजानां हितकाम्यया ॥३३॥
इत्यगस्तिविरचितं श्रीमहालक्ष्मीस्तोत्रं संपूर्णम् ।।
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अनेकक्रियानेक शक्तिस्वरूपं सदा शक्तिरूपं गणेशं नमामः ॥ ९॥
प्रधानस्वरूपं महतत्वरूपं धरावारिरूपं दिगीशादिरूपम् ।
असत्सत्स्वरूपं जगद्धेतुभूपं सदा विश्वरूपं गणेशं नमामः ॥ १०॥
त्वदीये मनः स्थापयेदङ्गियुग्मे जनो विघ्नसङ्खान्न पीडां लभेत ।
लसत्सूर्यविम्बे विशाले स्थितेऽयं जनो ध्वान्त पीडां कथं वा लभेत ॥ ११॥
वयं भ्रामिताः सर्वथाऽज्ञानयोगा दलब्ध्वा तवाङ्किम बहून्वर्षपूगान् ।
इदानीमवाप्तास्तवैव प्रसादात् प्रपन्नान सदा पाहि विश्वम्भराद्य ॥ १२॥
एवं स्तुतो गणेशस्तु सन्तुष्ठोऽभून्महामुने ।
कृपया परयोपेतोऽभिधातुं तान् प्रचक्रमे ॥ १३ ॥
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